सिर पर भारी बोझ उठाये चलता है
जिससे सारे कुनबे का पेट पलता है

आंगन से बाहर नहीं निकल पाती 
बेटी का आंचल ना होना खलता है

दिन भर कड़ी धूप में वो बदन जलाये
तब कहीं घर का चूल्हा जलता है

कोई मेहमां गर कभी आ जाये
रोटियां बांट कर खुद को छलता है

और अब “आभा” क्या कहूं क्या मिले
घर से ना निकलूं तो कल नहीं मिलता है..
आभा…

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