नजदीकियां तो हम भी बढ़ा लेते उनसे…
पर एक तरफा इश्क़ के खुमार का, नशा ही कुछ ओर था …
मेरे अजीब दोस्तों का तुम्हें भाभी कह के बुलाना और
उनके अजीब नुस्खो का मजा ही कुछ ओर था…

वो कक्षा मे तेरे आने पर मेरे दोस्तों का चीखना चिल्लाना…
और उनके अजीब सवालों पर मेरा लापरवाही से मुस्कुराना…
वो छिपा छिपा के यु इश्क़ को जताना कुछ ओर था…
उन अजीब इश्क़ के पेथरो का, मजा ही कुछ ओर था …

वो दोस्तों के पूछने पर तेरी हजारों खामियां गिनाना…
तेरे सामने से निकलने पर धिरे से जुल्फों में हाथ फिराना…
वो काँपी के बहाने फ्लर्ट करने का समा ही कुछ ओर था…
तेरी खामियों मे खूबिया ढुढने का मजा ही कुछ ओर था…

रोज तेरी गलियों से गुजर कर तेरी बालकनी में नजरे फिराना…
एक हल्की सी मुस्कान के साथ तेरी नजारों से नजरें मिलाना…
जन्मदिन पर खुद ही केक खरीद कर खाने का रिवाज कुछ ओर था…
उस तरहा अनकहे इश्क़ का मजा कुछ ओर था …

नजदीकियां तो हम भी बढ़ा लेते उनसे…
पर एक तरफा इश्क़ के खुमार का, नशा ही कुछ ओर था …
उन अजीब इश्क़ के पेथरो का, मजा ही कुछ ओर था …

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