फिर एक मंदिर ढहा है आज,
एक मस्जिद शहीद हुई है,
इंसानों की बस्ती मैं देखो आज,
फिर नफ़रत की जीत हुई है ||

मैं हिन्दू मैं मुसलमां,
मैं फ़लां, मैं फ़लां,
किस – किस नाम से पुकारूं तुझे,
ऐ इंसा, तू बता ||

सालों से साथ रहते रहते,
अचानक हमें ये क्या हुआ,
सहिष्णु यकायक असहिष्णु ‘औ’,
जिगरी दोस्त, दुश्मन हो गया ||

कभी खाई थीं सेवइयां और गुझियाँ,
हमनें जिनके साथ,
उन्ही के खून से रंग रहे हो देखो,
तुम अपने हाथ|

आँखें खोलो दोस्तों, मेरे भाइयों,
यूँ ना बहको,
ये तो सियासत का दलदल है यार,
तुम इसमें ना फिसलो ||

क्यों कर रहे हो ये क़त्ल-ओ-आम तुम,
और किसके कहने पर,
अरे, ये नेता तो अवसरवादी हैं,
दो मुट्ठी ख़ाक भी ना डालेंगे,
तुम्हारी क़ब्र पर ||

-आलोक श्रीवास्तव

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