काश कि ये हालात,एकबार फिर बदल जाते,
अबकी तेरे बदलने से पहले,हम बदल जाते,

कितना ग़मज़दा रहा हूँ,तेरी जुदाई में सनम, 
मेरे हालत देख कर ,पत्थर भी पिघल जाते,

सिवा तेरे कोई और चेहरा,अच्छा भी न लगा,
अक्ल पे पर्दा न होता,तो शायद संभल जाते,

वो पहली मोहब्बत थी,जो भुलाई नही गई,
काश कि बच्चे ही रह जाते ,तो बहल जाते,

ना गुजरते तेरी बदनाम गली से,उस रोज़,
ए ख़ुदा,जूनूने-इश्क से,बच के निकल जाते,
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मनोज सिंह”मन”

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