ए दिल ये तेरी जिद, मुझे नादानी लगती है,
उसे पाने की उम्मीद,अब बेमानी लगती है,

क्यों खोया है तू,उसके खाब्बों-ख्यालों में,
मुझे, वो किसी और की दीवानी लगती है,

माना,देखा था कभी उसने,यू तुझे प्यार से,
वो नादाँ सी लड़की,मुझे सयानी लगती है,

किसी को,दिल में बसा लेना बड़ी बात नही,
पर,यादों को भुलाने में,सारी जवानी लगती है,

कभी “मन” भी पागल था,किसी के प्यार में,
अब वो गुजरे वक़्त की,एक कहानी लगती है,
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मनोज सिंह”मन”

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