दूरियां दीवार की मोहताज़ नहीं होती
नफ़रते तलवार की मोहताज़ नहीं होती

कौन बोले है न बोले रब के लिये 
ज़िंदगी ये प्यार की मोहताज़ नहीं होती

शिक़स्त होती नहीं यूँ दिल की मिरे
मुहब्बत इज़हार की मोहताज़ नहीं होती

छिप नहीं सकती मिरी ख़बर माँ तुझसे
तू किसी अख़बार की मोहताज़ नहीं होती

देश की इतनी ग़रीबी शुक्र है घटी
खीर अब त्योहार की मोहताज़ नहीं होती

मानता हरगिज़ नहीं दिल मिरा तिरी
आँख अब दीदार की मोहताज़ नहीं होती

बेज़ुबानी चोट वो दिल पे जाय कर
दुश्मनी तक़रार की मोहताज़ नहीं होती

—सुरेश सांगवान’सरु’

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