हुआ बहुत प्रलाप अब, दूर करो संताप अब,
निर्दोषों के खून का, धरती मांगे हिसाब अब |

सूनी कोख और सूनी बाहें, राह तकती सूनी निगाहें, 
कैसे आये क़रार अब, धरती मांगे हिसाब अब |

सरहदों पर मरते जवान, कहीं पेशावर कहीं सीवान,
माओं को कौन समझाए अब, धरती मांगे हिसाब अब |

सियासतदां घरों में बैठे, सियासत की नई चालें चलते,
सैनिक होते लहुलुहान अब, धरती मांगे हिसाब अब |

कब तक चलेगा ये मौत का खेल, क्या होगा कभी ये मेल?
मुल्क मांगे जवाब अब, धरती मांगे हिसाब अब |

 

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