यूँ चेहरे पर नक़ाब लगाते हैं लोग,
कुरेद के ज़ख्म मेरे, मुस्कुराते हैं लोग,

आइने का ही ऐतबार हो तो कैसे हो, 
कि आइने भी अब, रंगीं बनाते हैं लोग,

महफ़िलों में अक्सर, हाथ मिलाते हैं जो,
दश़्त में तन्हा, हाथ छोड़ जाते हैं लोग,

और कुछ न सही फकत इतना ही सही,
ग़ुमनाम, ज़माने ने सिखाया मुझे,
यहाँ मोल ए वफ़ा कुछ भी नही..

यहाँ… मोल ए वफ़ा कुछ भी नही,
अक्सर, पैसे से खरीदे जाते हैं लोग… ग़ुमनाम

Facebook Comment

Internal Comment

Leave a Reply