चांदनी क्यों इतराती है खुद पे इतना,
कंही छुप जाये मेहताब,तो क्या होगा,

कुछ रुका सा है,नाजुक सी पलकों में, 
ग़र बह जाये ये सैलाब,तो क्या होगा,

तमाम उम्र खुशियों के साथ जिये तुम,
माँग लू ग़मो का हिसाब,तो क्या होगा,

अभी मगरूर हो,ये उम्र का तकाज़ा है,
जब ढल जायेगा शबाब, तो क्या होगा,

लिहाज़ तेरा है,कि अबतक चुप रहा हूँ,
मै पलट कर दे दू जबाब,तो क्या होगा,

यंहा सब कहते है,कि वो हमदर्द है मेरे,
हट जाये सबका नकाब,तो क्या होगा,
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मनोज सिंह”मन”

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