जिसकी वजह से हम बदनाम हुये हैं शहर में यारो,
उस शक़्स को आज तक हमने करीब से देखा तक नहीं…

तलब मौत की करना गुनाह है ज़माने में यारो,
मरने का शौक है तो मुहब्बत क्यों नहीं करते…

काश! कि वो लौट आयें मुझसे यह कहने,
कि तुम कौन होते हो मुझसे बिछड़ने वाले…

बड़ी तब्दीलियाँ आईं हैं अपने आप में लेकिन,

तुझे याद करने की वो आदत नहीं गयी… 

हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते हैं,
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं…♥

ठंडी हवाएं क्या चली मेरे शहर में,
हर तरफ यादों का “दिसंबर” बिखर गया…♥

खुदा तो मिलता है इन्सां ही नही मिलता,
ये वो चीज़ है जो देखी कहीं-कहीं मैंने…

आज सच बोलते रहना कोई आसान काम नहीं,
लोग तो लोग है यहाँ आईने तक मुकर जाते है…

तलब मौत की करना गुनाह है ज़माने में यारो,
मरने का शौक है तो मुहब्बत क्यों नहीं करते…

किसे सुनाएँ अपने गम के चन्द पन्नो के किस्से,
यहाँ तो हर शक्स भरी किताब लिए बैठा है…

मिटा दे उसकी तस्वीर मेरी आँखों से ऐ खुदा,
अब तो वो मुझे ख्वाबों में भी अच्छी नही लगती…

काफिर के दिल से आया हूँ मैं ये देखकर,
खुदा मौजूद है वहाँ पर उसे पता नहीं…

बे-खुदी बे-सबब नहीं ग़ालिब,
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है…

उसकी आँखों को कभी गौर से देखा है फ़राज़,
रोने वालों की तरह जागने वालों जैसी…