हम खुबसूरत नही औरो की तरह
पर इस में भी गलती हमारी नही

उस ऊपर वाले ने हमे बनाने में जल्दी कर दी
इसलिए चेहरा बनाने में कुछ कमी कर दी।

ऐ अन्ज़ान बाबू,
जो खुद बदनाम है आज़मगढ़ शहर में,
वो… अब हमें बताता है जीने का तरीका।

ये ज़र, ये जमीं, ये सारे एहतमाम,
अदावत हैं यहीं के, वरना कहां से लाया था मैं।

बड़ी तकलीफ देती है वो ख्वाहिशें
जो हजारों कोशिश करने के बाद भी मुक्कमल नहीं होती।

एक टीस सी उठती है दिल में जब वो कहते हैं
कि मोहब्बत तो है मगर किसी और से।

जब आया मेरा चांद छत पर चांद देखने
तो चांद भी मेरे चांद का दीवाना हो गया।

जरा बारिश क्या हुई मेरे शहर में
के तेरी यादें बिखर गयी सावन की तरह ।

ऐ अन्ज़ान,
मै जो देखता हूँ, वो ही बोलने का आदी हूँ,
मै अपने आज़मगढ़ शहर का सबसे बड़ा फ़सादी हूँ…

ऐ अन्ज़ान,
हम फिर आयेंगें तुम्हारे लखनऊ शहर,
अभी तो हमें और जलील होना बाकी है।

उनकी यादों को पहन……….कर मतवाली हुयी जाती है
ऎ रात……….. इस सांझ को काजल का टीका लगा दो ना….
आभा चन्द्रा…

हर शख़्स का जहां में ये हाल-ए-ज़ार रहता है
नज़र में किसी का पल-पल इंतेज़ार रहता है

–सुरेश सांगवान’सरु’

इस मर्तबा सफर यूँ बेकार रहा,
उनकी गली में भी उनका दीदार न हुआ।

हमने तो उनको दिल दिया था यारो
मगर उनको गैरो की पायलें ज्यादा रास आयी ।

हमारा दिल भी उनका दिल नहीं जीत पाया,
और गैरो की पायलें ही उनको अपना बना गयी।

चांदनी बिखरा रहा है चाँद फिर भी
लोग हैं के कैद करने में लगे हैं

सुरेश सांगवान’सरू’

छोड़ आया उसकी गली भी, मयखाना भी,
जबसे पता चला वहां बेकदरे आने लगे।

यूं तो हम भी अनमोल थे यारो ,
मगर उनकी पायल के आगे कीमत जरा कम पड़ गयी।

मलाल इस बात का रहेगा उम्र भर मुझे
बहुत देर से आई जिंदगी की कदर मुझे

–सुरेश सांगवान’सरु’

कचरे का ढेर दरीचे में रख छोड़ा है मैनें
इन आँधियों का गुरूर कुछ यूँ तोड़ा है मैनें

–सुरेश सांगवान’सरु’

सर-ए-राह-ए-तलब दुनियां ग़म लेती है
ज़ुल्फ है की उलझ कर ही दम लेती है

—सुरेश सांगवान ‘सरु’