मगरूर हमें कहती है तो कहती रहे दुनिया,
हम मुड़ कर पीछे किसी को देखा नहीं करते…

मैंने कहा आज झुठ का दिन है,
वो गले से लगा कर बोली “तुम मेरे हो “…

तू हज़ार बार भी रूठे तो भी मना लूँगा तुझे,
मगर देख, मुहब्बत में शामिल कोई दूसरा ना हो…

चखे हैं जाने कितने जायके महंगे मगर ऐ माँ,
तेरी चुल्हे की रोटी सारे पकवानो पे भारी है…

लिपट-लिपट के कह रही हैं मुझसे ये सर्द हवाएं,
इक रात की मोहलत दो अलविदा कहने के लिए…<3

मुहब्बत में झुकना कोई अजीब बात नहीं है,
चमकता सूरज भी तो ढल जाता है चाँद के लिए…

वो जो सर झुकाए बैठे हैं, हमारा दिल चुराए बैठे हैं…
हमने कहा हमारा दिल लौटा दो,
वो बोली- हम तो हाथो में मेहँदी लगाये बैठे हैं… 

ठंडी हवाएं क्या चली मेरे शहर में,
हर तरफ यादों का “दिसंबर” बिखर गया…♥

ये मुहब्बत भी है क्या रोग फ़राज़,
जिसे भूले वो सदा याद आया…