जग हमे भुल जाये, पर तुम ना भुलाना कभी
आँखे कभी हमारी मिल जाये तो, आँखे ना चुराना कभी

हम जिन्दगी का सफ़र , साथ निभा तो नही सकते
पर जब साथ देने का समय आये तो हाथ ना छुङना कभी।

Nisha nik.

ऐ जिन्दगी मुझे तुझसे बस इतना चाहिए
तू कभी मेरा साथ देना या मत देना  Read more

हम दुअओ में तुम्हे मांगना नही चाहते
पर तुम्हे ही पाने की सोचते है  Read more

ऐ अन्ज़ान,
इस वकालत के पेशे में हर तरीका हमने आजमा के देखा है,
जो किस्मत से नही मिलते, वो किसी कीमत पर नही मिलते।

आंसुओ का कैसा ये मंजर है
ऐसा लगता आँखो में ही समन्दर है

आब -ए -चश्म आँखो से सदा बहता है
ऐसा लगता समन्दर का आब -ए -तल्ख़ है।
-Nisha nik

मोहबत में तन्हाई है
तेरे और मेरे मिलने में रूसवाई है
तूने अपनो को छोङा मेरे लिए
खुदा की नाइंसाफी देखो
मैने जग ही छोङ दिया तेरे लिए।

टुटती हूँ हर पल ऐसे
जैसे किसी के हाथो का खिलौना बन गई हूँ
कभी किसी के साथ को पाने के लिए टूटती हूँ
तो कभी किसी के साथ को भुलाने के लिए टूटती हूँ
कभी किसी के आँखो

कहीं रातो से जागी हूँ मुझे इस रात सोने दो,
तेरे गितो को सुनकर के मुझे बेहोश होने दो,
कहीं सदियों से बस मैं युहि हसती आई हूँ
तुमसे मिलकर आज मुझको ये पलकें भिगोना दो,
बहुत ढूंढा है जिन्दगी को, इतना थक चुकी हूँ मैं,
कि बस अब मुझे जमाने में कहीं गुमनाम रहने दो,

जब उदास होते थे तो कोई बात भी नहीं करता था
आज जब मुस्कुराते है तो लोग वजह पूछ लेते हैं।

मोहब्बत करने वालों का मक्का भी मदीना भी
ताज दिलों की धड़कन है ज़ेवर भी नगीना भी

–सुरेश सांगवान ‘सरु’

ये कौन न जाने दुआएँ दे रहा है
सूखे पत्ते को हवाएँ दे रहा है

–सुरेश सांगवान ‘सरु’

ऐ इश्क एक शिकायत हमको भी है तुझसे
गवाही दे तो दोनों तरफ की दिया कर
हमें मुजरिम बना देता है तेरा एकतरफा होना।

कहा हुआ अपनों का अब सुनाई देने लगा
छुपा हुआ था जो तुझमें दिखाई देने लगा

—सुरेश सांगवान’सरु’

मोहब्बत है मुझे तुमसे एक दिन तुझको भी हो जायेगी
छायी है जो ये घटायें बनकर खुशियाँ बरस जायेगी
कुछ इस तरह से होंगे इक दुजे के हम
कि हमारी मोहब्बत मिसाल बन जायेगी।

बातें दिल की हैं हर किसी से कह नहीं सकता
मैं एक क़तरा हूं तनहा तो बह नहीं सकता

सुरेश सांगवान ‘सरु ‘  Read more

ये किस मक़ाम पर जाने तक़दीर मुझे ले आई है
मन तन्हा टूटी कश्ती और फलक़ पे तन्हाई है
–सुरेश सांगवान’सरु’

ऐ मुल्क,
जब कभी जी में आये तो ले लेना इम्तिहान हमारी देशभक्ति का,
हम मुल्क की खातिर लहू भी दें देगें चिरागों में जलाने के लियें।

ऐ अन्ज़ान,
क्या कहा…,,
याद कर रहे हो…
हाय! भूल गये थे क्या?

सच कहूँ तो…
फ़ुरसत ना थी उनको,
कुछ हम भी मग़रूर थे,
नाम उनका भी कुछ कम ना था,
कुछ हम भी “वकील साहब” मशहूर थे।

कुछ आगो-चिंगारी खाक़ मिरी से माँगते हैं
ये लोग पानी भी सूखी नदी से माँगते हैं
–सुरेश सांगवान’सॅरू’