उसने नकाब फेंक कर एहसान कर दिया,
हमको बिना वजह ही बदनाम कर दिया ।

तारीख के समंदर में ताकत थी इस कदर, 
दुश्मन की हर निगाह को निगहबान कर दिया ।

तुमने भी एहद-ए-वफ़ा का ऐसा सिला दिया,
यादों के गुलिस्तां को श्मशान कर दिया ।

नज़र की शोखियों ने और गुफ्तगू ने उसकी,
नादाँ से इस दिल को परेशान कर दिया ।

दौलत-ए-इश्क़ की करतूत भी क्या रंग लायी है,
के पुरे शहर के शहर को बेईमान कर दिया ।

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