शिकस्त-ए-दिल कहूँ या वक़्त की दरकार,
बिछड़ गया वो मुझसे कभी था जो मेरा करार।

वो जिस तरह गया था अपनों को छोड़ के, 
लौट आने के उसके अब दिखते नहीं असार।

धड़कनें बढ़ गयीं दिल-ए-बेकरार की।
जवाब-ए-खत का उनके इस कदर था इंतज़ार|

ख़ुदा से भी ज़्यादा उस पर यकीन मुझको,
अब और इस से बढ़कर क्या होगा ऐत्बार।

मोहब्बतनामा लिखूं अब ये उमर नहीं,
ग़ज़ल कहके करता हूँ मैं दिल-ए-इज़हार|

 

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One comment on “बिछड़ गया वो मुझसे कभी था…

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    Bahut acchi lagi ye ghazal… 🙂

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