भारत का किसान आज भी परेशान
ना कोई पहचान ना कुछ सम्मान

भारत के रीढ़ में क्यूँ है पीड़
सहता रहता दर्दो नुकसान

सिर तोड़ मेहनत दिल तोड़ हसरत
सिर पर ओले दिल में शोले

बोलो किसान को मिलता क्या है
वो क्या जाने सफलता क्या है

घटती ज़मीन वो भी प्राण हीन
सूखता पानी क्या करे किसानी

जब सब हैं मौन ज्ञान देगा कौन
बीज खाद और पीड़कनाशी
क़र्ज़ में डुबो गये सत्यानशी

जब दुनियाँ सोए लंबी तानकर
मैं जुट जाता मन को मारकर

बरसे ओले खड़ी फसल पर
मेहनत पर उसके कौशल पर

ढाक के वही तीन पात पिछड़ा रहा सदा देहात
कभी इतवार नहीं सुख का हिस्सेदार नहीं

समान मेरा पर मैं दुकानदार नहीं
कोई मददगार नहीं क्यूँ मेरी सरकार नहीं

सदियों से मेरी हालत में कोई सुधार नहीं
कच्ची मिट्टी का झोंपड़ा घर चमकदार नहीं

फटा हुआ है थोड़ा सा कुर्ता कलफ दार नहीं
सीदा-सादा हूँ किसान मैं तो कलाकार नहीं

सुख औट खुशियों से क्यूँ मेरा सरोकार नहीं
अब ये मुझे हरगिज़ हरगिज़ स्वीकार नहीं

सुरेश सांगवान’सरु’

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