रख दे अब तू भी वहम का बादल निकाल के
क्या रख दूं तेरे सामने मैं दिल निकाल के

निकाल तो डाला मुझे महफ़िल से कई बार 
दिल से अपने देखूं में भी महफ़िल निकाल के

फिर से उसकी वाली गली में चल यार मिरे
ये मुझको ले आया कहाँ पागल निकाल के

कहते हैं बिजली सी अदा है तेरी जानां
तो दिखला दो बिजलियों से पायल निकाल के

पागल दीवानी फिरे कभी इधर कभी उधर
दुनियाँ को देखूं अगर मैं मंज़िल निकाल के

नामुमकिन है मिल जाए दूध असली आजकल
क्यूँ थैले से तू चल दिया चावल निकाल के

लो बिन पूछे ही रख दिया गालों पे ‘सरु’ के
अश्क़ों ने मेरी आँख से काजल निकाल के
suresh sangwan’saru’

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