आँख के आंसू सूख चले हैं,
होठों की मुस्कान है खो चली,
अब तो तेरी याद में, 
उम्र तमाम है हो चली ||

ग़र खुदा मिलेगा मुझे,
तो पूछूंगा ज़रूर,
ऐसी कौन सी खता थी मेरी,
कि रुखसत-ए-जान हो चली ||

अंजाम-ए-इश्क़ का इल्म ना था,
नादां गुस्ताख़ी कर बैठा,
करके खून अपने एहसासों का,
ज़ाया ज़िन्दगानी कर बैठा ||

उसे तो ख़बर भी न हुई,
मेरे जज्बातों की,
अनजाने में ही सही, दोस्तों,
अपनी मौत का सामान ले बैठा ||

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