अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ
ऐसे जिद्दी हैं परिन्दें कि उड़ा भी न सकूँ

फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया
ये तेरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ

मेरी ग़ैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे
उसने इस तरह बुलाया कि मैं जा भी न सकूँ

इक न इक रोज़ कहीं ढूंढ ही लूँगा तुझको
ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ____राहत इन्दौरी

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