जश्न मना काफ़िर जरा, आज मौका ख़ुशी का है,
जला है घर मेरा अभी, ये नज़ारा उसी का है,

बातें लिखी है वादों भरी, इन रद्दियो के ढेर में,
जला रहा हू जिसे अभी, ये ख़त भी उसी का है,

ना मना मातम यंहा, तू किसी की बर्बादियो का,
तू भी हंस खुल के यंहा, ये ज़माना हँसी का है,

काश वो पुछे कभी, हम जीते है किस हाल में,
जब से वो जुदा हुये है, अब हाल बेबसी का है,

दिल ने क्यों प्यार किया, तड़पेगा अब उम्रभर,
सजा इसे वाज़िब मिली, कसूर सारा इसी का है.
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मनोज सिंह”मन”

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