रह-रह कर अब याद आ रहा,
वो मेरा एकाकी जीवन।

इक कमरे का रहवासी था,
महलों सा एहसास लिए।
स्वयं पकाना खाना पीना,
कभी-कभी उपवास किए।
जन जीवन स्वच्छन्द और जँचता था बेवाकी जीवन,
वो मेरा एकाकी जीवन।

जब तक रहता कामकाज,
तब तक कुछ एहसास नहीं।
फुर्सत में फिर सोचा करता,
सब कुछ अब तक पास नहीं।
रातों को सन्नाटे में डसता था एकाकी जीवन,
वो मेरा एकाकी जीवन।

नव जोड़ों का भ्रमण देखकर,
सपने कितने पाले थे।
प्रणय भाव से दिल पर जैसे,
लगते लाखों भाले थे।
उम्मीदों के भँवर जाल में, कैसे कटेगा बाकी जीवन,
वो मेरा एकाकी जीवन।

भाग दौड़ से भरी जिन्दगी,
हाल हुआ यायावर सा।
बंद पड़ा बेकार किसी,
बिन सिगनल के टावर सा।
बिना पिये मदहोश पड़ा,लगता था क्यों साकी जीवन,
रह-रह कर अब याद आ रहा,वो मेरा एकाकी जीवन॥

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