एक दौर
जहाँ सिर्फ प्रगति की
विकास की बातें होनी थी
अत्याचार, भ्रष्टाचार के खिलाफ 
जंग औ जीत की बातें होनी थी

फिर क्यों चंद जुगनुओं से
सूरज घबराया है
क्यों राष्ट्रहित के बजाय
देश विरोधी और अलगाव की
बदले और बदलाव की बातें होती हैं

एक दौर
हर हाथ सुकार्य के लिए
तरक्की और अनिवार्य के लिए
भलाई के लिए उठने थे
बगावत के लिए उठ रहे हैं
चिंतन का विषय है
मंथन का विषय है
यह दौर…..

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